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Showing posts from May, 2020

////अर्जुन तुम कर्म करो//

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( पहला अध्याय) धृतराष्ट्र ने कहा कहो,संजय दिव्य चक्षु से। पाण्डव और मेरेसुत,करते क्या युद्ध में संजय ने कहा सुन ,धृतराष्ट्र की बातें। दिखा रहा दुर्योधन,गुरुद्रोण को सेना।।2 गाण्डीव कर से, छूटा क्यूँ जा रहा है। है जो धनंजय ,हारा क्यूँ जा रहा है।।1 जबतक हैं चलते,मनके द्वंद्व सारे। मिलता नही मनको,माधव के इसारे।।2 द्रोपदी के हो रक्षक ,हो शिशुपाल मर्दन। सूझे न पथ अब,रथ चलाओ मोहन।।3 जो प्रश्न व्यथित मन के हैं, मेरे नटवर। कठिन-सरल कोई अब बताओ उत्तर।।4 शिष्यस्तेहम शाधि मां त्वाम प्रपन्नम। जैसे भी हो ,धर्मधुरी का कराओ दर्शन।।5 हो तुम गुडाकेश,द्रोणशिष्य प्रिय धनुर्धर। पंडित नही करते शोक,कभी प्रियवर।।6 ये पांचभौतिक सत तो नही है। मग़र आत्मा असत तो नही है।।7 पुराने बसन त्याग,नवीन वस्त्र धारो। बधा है शरीर,आत्मा को मुक्त मानों।।8 मिला गर है जीवन ,तो मृत्यु भी सच है। कमल यदि खिला है,फिर संकुचन भी लिखा है।।0 आत्मा स्वयं शुद्ध परमात्मा है। नही शस्त्र खंडन,नही अग्नि दाहन,नही जल क्लेदन, नही  वायु शोषन कर सका है।।11 जय पराजय छोड़कर,हो जाओ अ...

प्रिय मित्र आदित्य जी के लिये लिखा गया गीत

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जो व्यथा तुमको मिली है,मित्र मैं भी जी रहा हूँ उस व्यथा में। चाहता हूँ बाँट लूँ पीड़ा तुम्हारी,पर नही हिम्मत है आई बात करलूँ तुम्हीं से।2 जानता हूँ अब तलक तुम दिन न देखे थे खुसी के। उस निठुर नियति ने है भेजा, काले बादल शोक के।।2 हार के अब रुक न जाना,निष्ठुर नियत के बार से तुम। पग बढ़ाना धीरे -धीरे ,न सोचना के पराजित हो गये तुम।।3 अकेले आते सब जमी पर,संधर्ष भी होता अकेले। जीतकर या हारकर भी,रह जाता हर व्यक्ति अकेले।।4

💐💐💐माँ की डाँट अच्छी लगती है💐💐💐

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माँ की डाँट अच्छी लगती है। जो सुख-दुःख में बाँधे रखती है।।1 जबसे छोड़ गयी ,वो मुझको। कहाँ सुध,अब अपनी रहती है।।2 नही पढ़ी थी,नही लिखी थी। फिर भी राज ,पूरे घर पर करती थी।3 कुछ तो था,जो पता उसे था। अब माँ बस, अंधेरों में दिखती है।4 माँ की डाँट,अब अच्छी लगती है...। जो सुख- दुःख में बाँधे रखती है।।

///न जाने अब मिलेंगे कहाँ///

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न जाने अब हम...मिलेंगे कहाँ। न जाने मिलकर....खिलेंगे कहाँ।। किसी को सताया हो तो, किसी को रुलाया हो तो, मुझे माफ़ करदेना तुम....यारों मेरे... न जाने अब हम,मिलेंगे कहाँ।।1 जीवन छोटा होता यहाँ। इसमें सबको जीना यहां।। कल क्या होगा यहां,किसको पता है। मिलके करें जो हम,कल हो न हो.... न जाने अब हम,मिलेंगे कहाँ....।।2 कुछ नें पाया अपना मकां। कुछ ने पाया,सारा जहां। मैंने क्या पाया यहां,मैनें क्या खोया यहाँ। कोई न जाने मेरा,दिल ही तो जाने.... न जाने अब हम,मिलेंगे कहाँ।।3

////माँ के रूठने पर लिखा गया गीत///

चुपचाप रहो न, अब कुछ  बोलो तुम। दीवार ढली है जो रिश्तों की ,अब मत तोड़ो तुम।।1 क्या सच है क्या ग़लत किया, ख़ुद ही सोचो तुम। मौन से बेहतर बड़बड़ करते,खुश रहना तुम।।2 वन वन भटकी बन बैरागन,सीता को विस्मृत न करना तुम। पतिप्रीत में प्रेम निभाने,हर क्षण क्षण कुछ न कुछ करना तुम।।3 माँ रूठी है कब बच्चों से,क्या समझायें अब तुमको हम। नौ नौ माह भार को ढोये,अब क्यों जीवन भार लगे हम।।4

💐💐विदाई गीत💐💐

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मेरे यारों ये कैसा समा आ गया। कब मिले थे के,विछणन का पल आ गया।।1 जब जुदा हम यहाँ से,हो जायेंगे। फिर न जाने कहाँ हम मिल पाएँगे।।2 मैंने चाहा न पाया तो क्या हो गया। तेरी यादों को चादर,बना सो गया।।3 जिस्म का रूह से ना, मिलन हो सका। सोचते सोचते फिर समय हो चला।।4 दोस्ती की मैं कैसे इबारत लिखूँ। सोचता हूँ कि कुछ बात दिल में रखूँ।।5

प्रणय गीत-(मित्र दीपक द्विवेदी जी के लिए लिखा गया ,fresher party के अवसर पर M.A frist year bhu

मेरा है नाम सुभ दीपक,इशारा यूँ मैं करता हूँ। है माना तुम हो इक सूरज,उजाला मैं भी करता हूँ।। मोहब्बत में पड़ा हर एक आशिक़ चाहता क्या सुन। सके गर स्वीकार न मुझको,तो करना न किसी को तुम।।1 रहो अब मौन यूं न तुम,करो दिल की अपनी बातें। मिले कुछ चैन भी मुझको,मिले आराम भी तुमको।। नही परवाह करना प्रेम के जानी दुश्मनों को तुम। डगर होती मोहब्बत की न  रण से एक भी तो कम।।  2                               मैं क्या जो करना क्या,समझ में ये नही आता। जो चेहरा देख लूं उसका,तो कुछ भी नही भाता।। मिले गर साथ जो तेरा,तो मैं यूँही समझ लूंगा। जो जीवन कट रहा था बस,समझना पूरा जी लूँगा।।3 तुम्हें जब देखा था पहली,दफ़ा तो याद कुछ ना था। पढ़ा कुुछ था,लिखा जो था,भुलाया आज सब कुुछ था।। मग़र सब भूल के भी तो,कहाँ तुमको भुला पाया। गया था तोड़ जो शीशे,मग़र तूही नज़र आया।।4 यहाँ बैठे हैं सब लेकिन,कोई बैठा न दिल से है। जुबां पे एक सबके है,मग़र कहना किसे क्या है।। जवानी बीत जाएगी,मेरी ये बात सुन लेना। बुढ़ापे में नही कोई,क...

भगवती -भजन

साल में बार दो बार आती हो तुम। चैत्र आश्विन महीने में आती हो तुम।। अनगिनत दोष हममे भरे हैं मग़र। स्नेह ममता की धारा,लुटाती हो तुम।। भाव से जो भरा, वो तेरा लाल माँ। तेरी करुणा का प्यासा,है संसार माँ।।.....साल में बार 1 रात्रियों में सुभा,है नवरात्रि माँ। भक्त के धैर्य की,परीक्षा नवरात्र माँ।। शब्द के जाल में,तुम्हे क्या बुनें। तुम शरदपूर्णिमा सी जानराशि माँ।।....साल में बार 2 पालकर -पोषकर है किया इस क़दर। ऋण कहाँ से सुरु और कहाँ हो खतम।। स्वास जबतक चले,प्रीत न हो ख़तम। तेरे चरणों मे डूबे रहे तन और मन।।3...साल में बार 

भजन-प्रभू तुम्हारे आज सामने खड़ा हूँ मैं याचक बनके

प्रभू तुम्हारे आज सामने,खड़ा हूँ मैं याचक बनके। दे देना मुझको भक्ति,और न हो कहीं अनुरक्ति।।1 मूढ़ ,अज्ञ प्राणी मैं स्वामी,तुम हो समरथ घतवासी। नर की सेवा करते करते,मिल जायेंगे वैकुंठवासी।।2 बीत रहा जीवन क्षणभंगुर,पता नही क्या कल होगा। करले भजन मुरलीधर का,सोच न पगले अब कल का।।3

प्रेरणादायक -गीत(राम चरित्र)

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                  माँ-पिता हैं बढ़के सबसे,है सिखाया राम नें। छूट जाए प्राण गर भी,प्रण न छूटे राम के।। स्वीकार वेदनाओं का ,हँस के किया श्रीराम नें। मूल क्या है क्या पता,वचन हैं पाले राम नें।।                         2   राम के ही कर्म ने,पथप्रसस्त किये समाज को।   सोच और समझ के करना ,तुम भी अपने काज को।।    एक क्षण में छोड़कर,चले समग्र धाम को।   सीखना है पाठ त्याग,तो पढ़ो श्रीराम को।।                            3 जो कुटिलता कर रहे थे,सुबह और शाम को। कर दिया उन्हें भी माफ़, भवितब्यता को जान कर।। लोग क्या कहेंगे कुछ,न सोचो अब आराम दो। स्वास स्वास में रमे,नमन रमापति श्रीराम को।।                           4 कितने हुये हैं चक्रवर्ती,भूपाल सारे अनगिनत। ख़ाक में मीले हैं सब,बचा है सिर्फ़ काम ही।। कर्म से हुआ है नाम,वंश, ...

//////💐ब्राह्मण वन्दना💐//////

पड़े जहां चरणरज ब्राह्मणों की,               वो घर नही ,स्वर्ग है जहाँ का। है काँटों से,भरा जो जीवन,               वो फूलों से हैं महके उपवन।।1 हुई धन्य धरा,ब्राह्मणों को पाके,           जिन्होंने बस गान, यही है गाया। सभी निरोगी, सभी सुखी हों,           नहीं जहाँ में,कोई दुःखी हो।।2 धरी जो धरणी,प्रभू ने समझो,              तो ब्राह्मणों की कृपा वहाँ थी। हुआ रामनाम ,जगत में जिनका।              तो ब्राह्मणों की दया वहाँ थी।।3 त्याग,तप जिनके दो धन है,             नही जीवन में कोई ग़म है। जिनके पावन चरणों के बल से,            विष्णु गए पुरुषोत्तम के पद पे।।5

भजन-हे जगतजननी ,हे शैलपुत्री

हे जगत्जननी हे शैलपुत्री कर दो कोरोना से सबको मुक्ति। शिव की प्रिया हो,गजानन की माता ,जगत को दिखाओ।         कोई युक्ति......हे जगत्जननी 1 पावन-पुनीता नवरात्रि है ये।घड़ी आज संकट की चारों दिशा है।। हम बालक तुम्हारे,तुम जननी हमारी,मिटा दो विपत्ति मिटा दो ।।           मिटा दो.........हे जगत्जननी 2 करो जग का रक्षण, विंध्यवासिनी तुम,जगत की नियंता ,माँ काली भवानी। अर्धनारेश्वरी तुम, सब करें देख तुमको नमामि नमामि।।3              हे जगत्जननी..........

💐💐💐💐मित्रों की स्मृति में लिखे गये कुछ असआर(शेर का बहुवचन असआर कहलाता है)💐💐💐

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शुभममिश्र,सनातन द्विवेदी,प्रिय वर्मनजी,सह्रदय आदित्य जी आज गिर याद आई अपने उन यारों की। धूप जैसे छाव लाई,नींद भरी रातों की।।1 मित्रों बिन जीवन में,स्वाद जैसे रूखा है। है अधूरी कामनी,कपोल यदि सूखा है।।2 सबको है याद आये सायद कुछ गैरों की। मुझको तो याद आये,अपने सब मित्रों की।।3 बोलता नही ज्यादा,फिर भी ख़याल सबकी रखता हूँ। अवसर यदि मिले साहब,जुबान मैं भी रखता हूँ।।4 लेखनी से लिखने की आदत उनकी होती है। जुबाँ से जो कह न पाये,चाहत तो उनकी भी रहती है।।5 दूरदर्शी हो गया हूँ,सोच भावी पलों को आज। मिलन ही बिछुणन का,स्पष्ट होता लक्षण है।।16 जब घड़ी बिछणन की,काल बनके आएगी। विज्ञ मेरे मित्रों को,काल बनके आएगी।।7 कुछ मित्र जीवन में ,ख़ास इतने होते हैं। सांस और ह्रदय से बढ़कर,पास इतने होते हैं।।8 मेरे स्वप्न सागर में, बस मित्रों की ही निशानी है। न नव्य कोई चाहत है,न कोई इरादे हैं।।9 मित्रता मुरली सी, मधुमयी कहानी है। इनके मुक्त पन्नों में ,छन्दों की निशानी है।।10 मित्रता मृदुलता की, साक्षात मूर्ति है। कालिदास ग्रंन्थों की,ढेर सारी सूक्ति है।।11 मित्रों का साथ,भाग्योद...

गीत-माँ मेरी माँ बस एक तू

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माँ मेरी माँ बस एक तू।         है इस जहाँ में बस एक तू।। तेरी साँसों से साँसें मेरी चल रही।      जैसे आजान मस्ज़िद से है गा रही।।1 चन्द सिक्कों के ख़ातिर,दूर हो गया।             तेरी यादों को चादर ,बना सो गया।।2 गीत ग़ज़लों में माँ का ही चहरा दिखा। ज़िन्दगी भर जिसे,गुनगुनाता रहा।।3 गांव से दूर है कुछ यूँ अपना शहर । तेरा मेरा है इतना बीच का सफ़र।।4 न कोई सुबह,न कोई शाम है। माँ तेरे बिन अधूरे मेरे ख़्वाब है।।5 बन गई बोझ जो,उम्र कटती नही। पाके आँचल तेरा,आस लगती नई।।5

💐💐गणेश वंदना💐💐

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करो करो करो करो,गजानना की वन्दना। बुद्धि जो विवेक जो ,सबको दे प्रचंडना।।1करो करो..... रोग दोष का प्रभु,करो नित्य भंजना।। न के सुमन स्वीकार करो,जय उमा नन्दना।।2करो करो.... गुरुओं के छाव में ,पूर्ण हो साधना। मित्रों का संग हो,और हो न वासना।।3करो करो..... वाणी का प्रभाव हो,विचार हो न खंडना। ऋषि मुनियों के ध्यान हो,नारी का अपमानना।।4करो करो.... अपमान हो न कभी,भगवतस्वरूप माँ-बाप का। होंगे जब प्रसन्न ये,मिलेगा सारा ब्रम्हाण्डना।।करो करो....5

बघेली गीत-होई कौनो काम धाम ऐसे जात लाहां हमार भैया///

होई कौनो काम धाम,ऐसे जात लाहां हमार भैया देवतलाब जात् लाहा,हमार भैया 2 घर वाले सोचत हाँ के कहउ घूमत लाहा। ऐसन नही बात हो,सगला गांव के कोरोना  से बचाबत लाहा.........हमार भैया.... 1 पद है सहायक के और,बोझ गाँव भर के दादा हो। मिलत कम तनख़ाह और पेट्रोल खर्च ज्यादा हो।। हमार भैया देवतलाब जात लाहा........2 सबके सेवा मा रात-दिन ,खड़े रहत हिमालय बन के प्रहरी हो। जानई सगला गांव  लेकिन हमार घर न जाना हो।। हमार भैया देवतलाब जात लाहा.........3

पिताजी की कहने पर (यजमान वृद्धि प्रार्थना) /

जब तक रहे खुसबू सुमन में,यजमान भी महकता रहे। महकता रहे महकता रहे ,यजमान भी महकता रहे।।1 बसन्त हो घरबार उसका,जीवन हो गुलज़ार उसका। नित नई खुशियाँ बिखेरे,ऐसा सुधड़ परिवार हो।।2 जब तक त्रिशूल पे काशी नगरी टिकी रहे। तब तक यजमान की सन्तति बढ़ती रहे।।3 जबतक धरा पे अविरल गङ्गा बहती रहे। तबतक धरा पे यजमान की जयकार होती रहे।।4 जबतक चरणरज विप्र के, शिर पर चढ़ती रहे। तबतक जहां में यजमान नितिनई वृद्धि करे।।5 जब तक अवनि पर व्योम की छाया पड़ती रहे। तब तक यजमान भी विप्रों तले विश्राम ले।।6

💐💐//कृष्ण भजन//💐💐 स्वर-प्रभुम प्राणनाथं

    प्रभू श्यामसुंदर दरश अब दिखाओ।       न तरसाओ मोहन,कोई पथ सुझाओ।।       हैं भटके हुये सब कलिकाल मारे।       मधुर वो मनोहर वेणू बजाओ।।1 देवकी ने जाया, यशोदा ने पाला। दिया दक्षिणागुरु पांचजन्य पाया।। दिया प्रेमसन्देश जगत को निराला। करो प्रेम सबसे जगत को बताया।।2         बने ग्वाल ब्रज के प्रभू द्वारिकाधीश।         मग़र मित्रता की सपथ न भुलाया।।         दिया ज्ञान जग को गुनगुनाकर के गीता।         बढ़ा मान भक्तों का,दुष्टों का घटाया।।3 किया गौ का चारण ,गोवर्धन को धारा। प्रभू प्रेम कुब्जा को सुन्दर बनाया।। अरज दौपद्री सुन,द्वारिका से भी आये। दिया जो वचन,वो सदा ही निभाया।।5 प्रभु श्याम सुंदर

💐💐बेबस माँ के भाव बेबस बेटे के प्रति//💐💐

मत घबड़ाना लाल मेरे तुम,जल्द ये बदलेगा मंजर भी। घनी रात है लम्बी लेकिन,जल्द ही शुभसूरज निकलेगा।।1 दूर हो तुम भी,दूर हैं हम भी,ऋतु की शायद मांग यही है। मांग मनोती करली माँ नें,मंदिर जाकर दूजी माँ से।।2 व्याकुल आंखें जोह रहीं हैं,कब वो लाल के वचन सुनेंगी। माँ इसमें क्या रक्खी तुम,सुनकर मीठे अश्रु बहेंगे।।3 ख़ुद का हित पीछे रखकर के,देश का हित आगे रखना तुम। लाल मेरे पीड़ा सहकर भी,सतपथ पर निश्चय चलना तुम।।4 सब हैं घर पर बस एक नही तू,तन मेरा यहां रूह वहाँ तू। होता  छोटा  कलेजा लेकिन,ज्येष्ठ वंशधरोहर हो तुम।।5

////////////💐मातृ-पितृ वन्दना💐/////////////////

पावन धरा धाम जहाँ में जो लाये। कठिन नो माह माँ ने भार उठाये।। देखकर के शिक्षा पिता ने चलाये। चरण माँ पिता के सत- सत नमाएँ।।1 जब-जब अंधेरों ने हमको सताया। उजाओं के पथ पर तुम्हीं ने चलाया।। हुई गलतियाँ हैं जाने न  कितनी। मग़र हर बार अवसर दिया सभलने का।2

कोरोना उन्मूलक- भजन

करो किरीटी कोरोना मुक्ति,नही है सामर्थ्य शिवा तुम्हारे। पिया गरल था जगत के रक्षण,न कोई हेतू तुम्हारा शिव था।। कहाँ तलक हम तुम्हें सुनाएं, तुम्हारे उपकार का लेखा-जोखा। करो जो नर्तन हो नाद ऐसी,मिले कोरोना से सबको मुक्ति। धरा की है ये पवित्र भूमि, जहां नटनागर ने वेणू बजाई।। नटराज हो तुम नट हम हैं सारे,सुन ली अरज न लगाओ देरी। देखी न विपदा किसी ने ऐसी,जगत्पिता अब हरो विपत्ति।। सपथ षड़ानन गणनाथ की है,समझ लो युक्ति न कोई अब है।।

कविता-बनारस की हो विदुषी तुम

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चमक सोने सी है तेरी,बनारस की हो विदुषी तुम। नयन भी तो है मृगलोचन, अदा गङ्गा के जल सी तुम।।1                    विना बारिश के बरसुंगा,गर मुझको मिली न तुम। बनो गर ख़ाब की वरूणा,तो अस्सी बन मिलेंगे हम।।2 लगाया जब मेरे चेहरे,पे अपना गुलगुलाबी  रंग। तो छाई थी मेरे ,तन -मन बस एक ही तुम्हारा रंग।।3 हुई थी जेब भी ख़ाली, मग़र कोई नही था गम। हंसी जब जब किसी के संग,फिर बेरंग हुआ था मन।।4 हमारे गीत ग़ज़लों में,तुम्हारा नाम अच्छा है। जमाने ने भला रक्खा,तुम्हारा नाम क्या-क्या है।।5 पता है तुम मिलोगे न,मग़र दिल मानता क्या है। लुटे हर बार हैं लेकिन,मग़र लुटना सजा क्या है?।।6 कोई पाया था एक सेल्फ़ी, कोई पाया अधिक  सेल्फ़ी। वहाँ था एक केवल मैं,जो ख़ुद था एक स्वयं सेल्फ़ी।।7 तुम्हारे हुस्न सागर में,कई डूबे हैं मद प्रेमी। बुझेगी प्यास उनकी न,कहाँ पावन वो गङ्गा है।।8 तुम्हारा रूप ये क़ातिल,कहीं मार डाले न। बनाना दूरियाँ तुमसे,सिखाया है कोरोना ने।।9 मेरा अविधा पूर्ण ये जीवन,तुम्हारा व्यंजनाओं सा। चलो निर्मित करें मिलहम,उत्तमकाव्य सा ...

भजन-💐💐जो कुछ पाया जगत में💐💐

                      💐💐💐💐💐भजन💐💐💐💐💐💐    जो कुछ पाया जगत में,सब तुम्हारा ही दिया है माँ।    नही अब चाहिए जग का,के अब तेरा सहारा माँ।।1             हुई है अनगिनत भूलें, क्षमा किन-किन की मांगें माँ। अकिंचन याचना करते,क्षमदात्री हो तुम जो माँ।।2    जगत के जाल पाशों से,कठिन है पार पाना माँ।  सहज मुक्ति बताओ ना, के अब मुक्ति है पाना माँ।।3 अमीरी में अहमता है,गरीबी में बड़ा दुःख माँ। जो काटी अब तलक जिंदगी,तुम्हारी सब कृपा है माँ।।4

💐 शेरे-ए-शहस्त्रकम💐

💐(शेर-ए-मयस्सर)💐 तुम्हारे हुस्न साग़र में कई डुबे हैं मद प्रेमी। बुझेगी प्यास उनकी न कहाँ पावन हो गङ्गा तुम।।1                      हमारे गीत ग़ज़लों में तुम्हारा नाम अच्छा।      जमाने ने भला रक्खा,तुम्हारा नाम क्या- क्या है।।2 थोड़ा सा मौका निकाल, हस् लेता हूँ। अकेला हूँ न!सब भूल नही पाता हूँ।।3                                          लोग कहते हैं चाँद बहुत बड़ा और बहुत दूर है।      अब देख लो मेरी अंगुली से छोटा और बहुत क़रीब है।।4 मुस्तक़िल तो इस जहाँ में कुछ भी नही ,न तुम,न हम। मोहब्बत-ए-नफऱत निबाह रहे हो,जैसे मुस्तक़िल तुम भी और हम भी।।5 हर जवान माँ-बाप से भाग,कहीं और जाना चाहता है। जैसे गृहस्थ सन्यस्त और सन्यस्त गृहस्थ होना चाहता है।।7 दिल से गाओ तो,कुछ बात हो। वरना गले से गाता, तो मेरा दोस्त भी था।।9 हर सहर बड़े प्यार से जगाती है। माँ है ना ?बड़ा हो गया हूँ भूल जाती है।।10 ...

गीत-वरस् ये नूतन है। स्वर-हुस्न पहाड़ों के

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वरस ये नूतन है,के भोले चरणों मे हम करते वन्दन हैं। नेत्र सजल भी हैं,के प्रभु चरणों में हम करते वन्दन हैं।। हुई जो भूलें अब तक तन-मन से। करदो भसम अब इनको नयन से। करूँ क्या प्रभु जी बोलो,तीनों पवन से। प्रभु चरणों मे हो प्रीत,करो कुछ ऐसा हो.....वरस ये नूतन है। धरती को चाहे ,अम्बर कर दे। सृष्टि को चाहे ,पलभर में बदल दे। मेरे लिये बस,इतना ही करदे। तेरे चरणों मे रहे ध्यान,चाहे में रहूं किस हाल....बरष ये नूतन है।