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Short story -गुमसुम बच्ची

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                                 गुमसुम बच्ची -  कृष्णवर्णाचहरा ,पतला शरीर ,लड़ती-झगड़ती चीखती-चिल्लाती लड़की थी अमृता । जब कोई हमारी सुनने वाला नहीं होता ,तो भी इंसान इस रूप को  धारण कर लेता है । पहले पहले जवाब नहीं देती थी; पर धीरे-धीरे बदलाव शुरू हो गया  एक दिन पूछा उसने सर शांत कैसे रहें ? जैसे आप रहते हैं ! मैंने  बताया यह कोई बीमारी थोड़ी है ,मैं भी खूब बचपन में गुस्सा करता था, हंसता था,रोता था ! यह तो बच्चा होने की निशानी है ! मैं नहीं चाहता था ;बच्ची का बचपन छीन लिया जए बस उसके चेहरे पर हंसी होती है, खूब प्रश्न होते हैं, कभी-कभी प्रश्नों से अवाक कर देती है । उसका एक प्रश्न याद है -अंबेडकर की तरह ,राम ने हमको क्या दिया है ?

#चरैवेति चरैवेति चरैवेति चरैवेति

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  चरैवेति चरैवेति चरैवेति चरैवेति ।      होगी होगी होगी होगी जीत तेरी होगी।।। गुनगुना गुना गुना गुना तू चरैवेति।।   घोल घोल घोल घोल महाध्वनी गीति।। चल रहा है सूर्य जैसे तू भी अब तो चलना।          बह रही पवन है जैसे तू भी अब तो बहना।। तप रहा है अग्नि जैसे तू भी अब तो तपना।। होगा जो कमजोर तू कोई साथ न तेरा देगा।      राह में पड़े कंकरों सा लात मार देगा।। बन विशाल चटटान तू जो हौसला चीर दे।      उड़ उड़ा उड़ा उड़ा यज की बन धूम तू।।

💐💐💐💐गणेश- भजन💐💐💐

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कष्ट में होंगे जब हम,वो हमें थाम लेंगे। गजानन का जब जब हम नाम लेंगे।। गणराज तुम्हारी जय होवे। हेरम्ब तुम्हारी जय होवे।।             हम दीन पड़े भवसागर में।             तुम दीनबंधु प्रभु कण- कण में।।1                                            जब -जब घेरें दुःख सागर से। तब तब बनना प्रभु बादल से।।2  गणराज......                   तुम हो गुणों के खान प्रभु।                   और हम हैं गुणों से हीन प्रभु।।3  गणराज.... सकल विपद अब हर लो प्रभु। सद्बुद्धि  विद्या के स्वामी ।।4  गणराज.....                      प्रथमपूज्य तुम गणाध्यक्ष ,रिद्धि सिद्धि के स्वामी हो।               गौरीशंकर के सुत तुम हो,विध्नों को हरने वाले हो।।5   ...

💐नवशक्ति वंदना💐

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  स्वर-आशुतोष शशांक शेखर..... दरिद्रता लक्ष्मी हरें।      कंटक महाकाली हरें।। माँ सरस्वती ज्ञान देवें।        त्रिदेवी जयजयकार हो।।         नमन बारम्बार हो।।१ दुर्गा माँ की नव है शक्ति।           शैलपुत्री प्रणाम हो।। दूजी ब्रह्मचारिणी माँ।          सुभग चंद्राघण्टा हो।।          नमन बारम्बार हो।।२ चौथी कुष्मांडा हैं धन्या।            रोग- शोक हरें सभी।। सकल-जग आधार है तू।               अम्बे जयजयकार हो।।३                नमन बारम्बार हो।। चराचर पालन करें जो।         स्कंदमाता नाम है।। गणपति-षडानन की हो भगिनी।         नमन बारम्बार हो।।          अम्बे जयजयकार हो।४ मुनि कात्यायन की हो जायी।            कात्यायनी विख्यात हो।। जगत के कल्याण हेतु।     ...

#बेरोजगार को रोज़गार दो!

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  बेरोजगार को रोज़गार दो,और न अबकुछ बोलो तुम। याद करो हर भाषण अपना,ख़ुद को अब तो तोलो तुम।। रोज नयी शिलान्यास और नई योजना न खोलो तुम। युवाओं का देश है प्यारे,युवा बन अब सोचो तुम।।१ योगी- मोदी जपते जपते हर युवा बेहाल हुआ। मिला न अबतक हमको कुछ भी,सच ख्याली पुलाव रहा।। दुल्हन सी सजवा मेनिफेस्टो का बस  परचार किया। हिंदी का प्रशिद्ध मुहावरा,लगता है बस नारा हुआ।।२ जब -जब सत्ता बुझ-सी जाती,जनता तो ही सुलगाती । वादे से तुम रोज मुकरते,सच से हो क्यों घबराते।। Ctet,uptet निकला है,उलझा अपना अधिकार कहीं। कर्तव्यों के बाद मांगते,हैं अपना अधिकार वही।।३

#कुछ अच्छा नही लगता!

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  💐💐जन्मदिवस के अवसर पर मनोभाव💐 ख़ुद से ख़ुद का जन्मदिवस मनाएँ ,कुछ अच्छा नही लगता। हम भी हो जाएं शामिल नादानों में,कुछ अच्छा नही लगता।।१ ख़ूब छुपाया है मैंने,सतीर्थ्यों*  से अपना जन्मदिन । इक बार इत्तला करदूँ,मग़र अच्छा नही लगता।।२    चाहता मैं भी हूँ मिले उपहार,कुछ मन कुछ बेमन से। बरस में मने इक बार ही त्यौहार, कुछ अच्छा नही लगता।।३ कुछ दोस्त साल में दो,चार,पांच भी मना लेते हैं। मग़र ठहरे हम कि, इक बार भी अच्छा नही लगता।।४

#इज्ज़त#

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  भला कौन नही चाहता इज्ज़त ! जैसे-दो मजदूर पति-पत्नी ;घर,बच्चे छोड़ निकल जाते हैं। दूर -दराज काम की तलाश में। एक साथ खोदते और पाटते हैं मिट्टी । और साथ ही चबाते  हैं,गुटखा,तम्बाकू। आज नया साल है,मग़र जेब में मौन चिल्लर हैं। मजदूरी पड़ी है ढेकेदार के जेब में,हिचकिचाहट है ;मांगने में ? मग़र माँगना पड़ा, अपने खातिर नही ,बच्चों के ख़ातिर। पति ने कहा: तुम कहो? पत्नी  ने कहा:तुम कहो? अंततः अबला,भीरु कही जाने वाली स्त्री ने सकुचाते हुये कहा: मालिक गर कुछ मिल जाता तो.... मालिक ने गम्भीर गर्जनध्वनि में कहा: कहीं भागे थोड़ी जा रहे हैं !  अगली सुबह सूरज तो निकला, मग़र मजदूर दम्पत्ति नही  निकले! मालिक को पता चल चुका था ;भला कौन नही चाहता इज्ज़त!