//भगवती-भजन (सवैया छंद)में
( 1) विष्णु की माया विंध्यवासिनी,दुःखियों का दुःख दूर करें हैं। तापत्रय का नाश करें और,सुखसागर संचार करें हैं।। काली-कराली खप्परवाली,सर्जन,पालन,संघार करें हैं। भाव की भूखीं हैं जगदम्बे,माँ जगतारिणी रूप धरीं हैं।। ( 2) देख तुम्हारी मोहनी-मूरत,लोचन धन्य आज भए हैं। मायाजग को निहारत देखत्,दुःखों के अम्बार लगे हैं।। सारे जग के पदारथ दूषित,निर्मल मन से भोग रचे हैं। मानव तन गर भक्ति भई ना, जीवन समझो व्यर्थ भयो हां।। (3) बचपन बीता खेलत -खात्,जवानी दु:स्प्नों में बीती। मौत से बदतर आया बुढ़ापा, राम रमे न चिन्ता व्यापी।। काम न छूटा,क्रोध न छूटा, लोभ न छूटा, देह छुटा है। जीवन क्षणभंगुर है बीता,जगतारिणी हर स्वास भजो रे।।