//हाथरस//विनम्र श्रद्धांजली
///शोक- गीत/////
काले-बादल घनेरे ,यहाँ छा रहे ।।
जो हुआ हाथरस* में ,हुआ क्या सही।
लहू आज पानी, बन बहा जा रहा।।1
आज शासन-प्रशासन, जनभक्षक हुआ।
घोरकृत्य का भी ,पूरा समर्थक हुआ।।
गर निकल जाता सूरज,घनी रात में।।
कुछ मिल जाती शान्ति,लगी आग में।।2
एक बुनियादी रस्ता,अब हमें चाहिए।
खोखली मैकाले- शिक्षा ,नही चाहिए।।
पाठ्यक्रम गर बने ,देवभाषा कहीं।।
ऐसे बलात्कारी कभी,पैदा होंगे नही।।3
पशु भी ऐसे धृणित कृत्य ,करते नही।
बिन ऋतु के कभी ,मान हरते नही।।
खीर मधु सी बनी हो,रोचक मग़र।।
बूंद एक भी गरल का,बहुत होता है।।4
भोग ही हो जहाँ ,लक्ष्य इंसान का।
फिर कहाँ मूल्य है,दिव्य जीवनदान का।।
था दनुज कुल का रावण ,पर ऐसा ना था !
विना इच्छा के सिय को,छुआ भी न था।।5

Nice
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