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////मजदूर व्यथा गीत////

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चल -चल के क़दम तुम्हारे,माना के थक गए हैं। फ़िर भी उन्हें कहाँ दिखा है,जो विराजे तुम्हारे लिये हैं।।1 ठिकाना बसर करने को ना है,खाने को ना है निवाला। जाएँ तो भी कहाँ जाएँ, अब बस सफ़र ही इक ठिकाना।।2 इक भोली-भाली बिटिया मोल द्विचक्रिका से,बनी बूढ़े बाप का सहारा।3 नन्हें कदमों से नापने चली है,मानो क़ुदरत का आसियाना।।3 लाल किले प्राचीर से बस,होती है मजदूरों की बातें। मग़र उतरते सब हो जाता है,मजबूरों की बातें।।4