कविता-बनारस की हो विदुषी तुम





चमक सोने सी है तेरी,बनारस की हो विदुषी तुम।
नयन भी तो है मृगलोचन, अदा गङ्गा के जल सी तुम।।1

                  
विना बारिश के बरसुंगा,गर मुझको मिली न तुम।
बनो गर ख़ाब की वरूणा,तो अस्सी बन मिलेंगे हम।।2

लगाया जब मेरे चेहरे,पे अपना गुलगुलाबी  रंग।
तो छाई थी मेरे ,तन -मन बस एक ही तुम्हारा रंग।।3

हुई थी जेब भी ख़ाली, मग़र कोई नही था गम।
हंसी जब जब किसी के संग,फिर बेरंग हुआ था मन।।4

हमारे गीत ग़ज़लों में,तुम्हारा नाम अच्छा है।
जमाने ने भला रक्खा,तुम्हारा नाम क्या-क्या है।।5

पता है तुम मिलोगे न,मग़र दिल मानता क्या है।
लुटे हर बार हैं लेकिन,मग़र लुटना सजा क्या है?।।6

कोई पाया था एक सेल्फ़ी, कोई पाया अधिक  सेल्फ़ी।
वहाँ था एक केवल मैं,जो ख़ुद था एक स्वयं सेल्फ़ी।।7

तुम्हारे हुस्न सागर में,कई डूबे हैं मद प्रेमी।
बुझेगी प्यास उनकी न,कहाँ पावन वो गङ्गा है।।8

तुम्हारा रूप ये क़ातिल,कहीं मार डाले न।
बनाना दूरियाँ तुमसे,सिखाया है कोरोना ने।।9

मेरा अविधा पूर्ण ये जीवन,तुम्हारा व्यंजनाओं सा।
चलो निर्मित करें मिलहम,उत्तमकाव्य सा जीवन।।10
                    💐
मेरे शब्दों में तुम अंकित,मेरे भावों में तुम अंकित।
नही अब चाहता हूं कि,कोई अब और हो अंकित।।11

                     💐

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