प्रेरणादायक -गीत(राम चरित्र)
माँ-पिता हैं बढ़के सबसे,है सिखाया राम नें।
छूट जाए प्राण गर भी,प्रण न छूटे राम के।।
स्वीकार वेदनाओं का ,हँस के किया श्रीराम नें।
मूल क्या है क्या पता,वचन हैं पाले राम नें।।
2
राम के ही कर्म ने,पथप्रसस्त किये समाज को।
सोच और समझ के करना ,तुम भी अपने काज को।।
एक क्षण में छोड़कर,चले समग्र धाम को।
सीखना है पाठ त्याग,तो पढ़ो श्रीराम को।।
3
जो कुटिलता कर रहे थे,सुबह और शाम को।
कर दिया उन्हें भी माफ़, भवितब्यता को जान कर।।
लोग क्या कहेंगे कुछ,न सोचो अब आराम दो।
स्वास स्वास में रमे,नमन रमापति श्रीराम को।।
4
कितने हुये हैं चक्रवर्ती,भूपाल सारे अनगिनत।
ख़ाक में मीले हैं सब,बचा है सिर्फ़ काम ही।।
कर्म से हुआ है नाम,वंश, कुल,न जाति से।
राम से बड़ा है नाम,जग को बताया राम ने।।
5
धर्म व्यक्ति का अलग,अलग है धर्म राष्ट्र का।
राम ने त्यागा नही कभी भी धर्म स्वत्व का।।
वन वन भटक के सीय ने,रखा है मान प्रेम का।
प्रासाद मे भी रहके,राम जीवन जिये वनवास का।।
स्वीकार वेदनाओं का ,हँस के किया श्रीराम नें।
मूल क्या है क्या पता,वचन हैं पाले राम नें।।
2
राम के ही कर्म ने,पथप्रसस्त किये समाज को।
सोच और समझ के करना ,तुम भी अपने काज को।।
एक क्षण में छोड़कर,चले समग्र धाम को।
सीखना है पाठ त्याग,तो पढ़ो श्रीराम को।।
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जो कुटिलता कर रहे थे,सुबह और शाम को।
कर दिया उन्हें भी माफ़, भवितब्यता को जान कर।।
लोग क्या कहेंगे कुछ,न सोचो अब आराम दो।
स्वास स्वास में रमे,नमन रमापति श्रीराम को।।
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कितने हुये हैं चक्रवर्ती,भूपाल सारे अनगिनत।
ख़ाक में मीले हैं सब,बचा है सिर्फ़ काम ही।।
कर्म से हुआ है नाम,वंश, कुल,न जाति से।
राम से बड़ा है नाम,जग को बताया राम ने।।
5
धर्म व्यक्ति का अलग,अलग है धर्म राष्ट्र का।
राम ने त्यागा नही कभी भी धर्म स्वत्व का।।
वन वन भटक के सीय ने,रखा है मान प्रेम का।
प्रासाद मे भी रहके,राम जीवन जिये वनवास का।।

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