प्रिय मित्र आदित्य जी के लिये लिखा गया गीत
जो व्यथा तुमको मिली है,मित्र मैं भी जी रहा हूँ उस व्यथा में।
चाहता हूँ बाँट लूँ पीड़ा तुम्हारी,पर नही हिम्मत है आई बात करलूँ तुम्हीं से।2
जानता हूँ अब तलक तुम दिन न देखे थे खुसी के।
उस निठुर नियति ने है भेजा, काले बादल शोक के।।2
हार के अब रुक न जाना,निष्ठुर नियत के बार से तुम।
पग बढ़ाना धीरे -धीरे ,न सोचना के पराजित हो गये तुम।।3
अकेले आते सब जमी पर,संधर्ष भी होता अकेले।
जीतकर या हारकर भी,रह जाता हर व्यक्ति अकेले।।4
जानता हूँ अब तलक तुम दिन न देखे थे खुसी के।
उस निठुर नियति ने है भेजा, काले बादल शोक के।।2
हार के अब रुक न जाना,निष्ठुर नियत के बार से तुम।
पग बढ़ाना धीरे -धीरे ,न सोचना के पराजित हो गये तुम।।3
अकेले आते सब जमी पर,संधर्ष भी होता अकेले।
जीतकर या हारकर भी,रह जाता हर व्यक्ति अकेले।।4

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