प्रणय गीत-(मित्र दीपक द्विवेदी जी के लिए लिखा गया ,fresher party के अवसर पर M.A frist year bhu
मेरा है नाम सुभ दीपक,इशारा यूँ मैं करता हूँ।
है माना तुम हो इक सूरज,उजाला मैं भी करता हूँ।।
मोहब्बत में पड़ा हर एक आशिक़ चाहता क्या सुन।
सके गर स्वीकार न मुझको,तो करना न किसी को तुम।।1
रहो अब मौन यूं न तुम,करो दिल की अपनी बातें।
मिले कुछ चैन भी मुझको,मिले आराम भी तुमको।।
नही परवाह करना प्रेम के जानी दुश्मनों को तुम।
डगर होती मोहब्बत की न रण से एक भी तो कम।। 2
मैं क्या जो करना क्या,समझ में ये नही आता।
जो चेहरा देख लूं उसका,तो कुछ भी नही भाता।।
मिले गर साथ जो तेरा,तो मैं यूँही समझ लूंगा।
जो जीवन कट रहा था बस,समझना पूरा जी लूँगा।।3
तुम्हें जब देखा था पहली,दफ़ा तो याद कुछ ना था।
पढ़ा कुुछ था,लिखा जो था,भुलाया आज सब कुुछ था।।
मग़र सब भूल के भी तो,कहाँ तुमको भुला पाया।
गया था तोड़ जो शीशे,मग़र तूही नज़र आया।।4
यहाँ बैठे हैं सब लेकिन,कोई बैठा न दिल से है।
जुबां पे एक सबके है,मग़र कहना किसे क्या है।।
जवानी बीत जाएगी,मेरी ये बात सुन लेना।
बुढ़ापे में नही कोई,किसी को याद रहता है।।5
रातें-दिन यहीं सोचूँ,कि दिल की बात अब कह दूं।
मग़र डरता हूँ के तुमको,कहीं बदनाम ना करदूँ।।
इसी ही सोच में घुटघुट के,जीवन जी रहा हूँ मैं।।
तुम्हारे हुस्न को कैसे,किसी के नाम करदूँ मैं।।6
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