////अर्जुन तुम कर्म करो//
(पहला अध्याय)
धृतराष्ट्र ने कहा कहो,संजय दिव्य चक्षु से।
पाण्डव और मेरेसुत,करते क्या युद्ध में
संजय ने कहा सुन ,धृतराष्ट्र की बातें।
दिखा रहा दुर्योधन,गुरुद्रोण को सेना।।2
गाण्डीव कर से, छूटा क्यूँ जा रहा है।
है जो धनंजय ,हारा क्यूँ जा रहा है।।1
जबतक हैं चलते,मनके द्वंद्व सारे।
मिलता नही मनको,माधव के इसारे।।2
द्रोपदी के हो रक्षक ,हो शिशुपाल मर्दन।
सूझे न पथ अब,रथ चलाओ मोहन।।3
जो प्रश्न व्यथित मन के हैं, मेरे नटवर।
कठिन-सरल कोई अब बताओ उत्तर।।4
शिष्यस्तेहम शाधि मां त्वाम प्रपन्नम।
जैसे भी हो ,धर्मधुरी का कराओ दर्शन।।5
हो तुम गुडाकेश,द्रोणशिष्य प्रिय धनुर्धर।
पंडित नही करते शोक,कभी प्रियवर।।6
ये पांचभौतिक सत तो नही है।
मग़र आत्मा असत तो नही है।।7
पुराने बसन त्याग,नवीन वस्त्र धारो।
बधा है शरीर,आत्मा को मुक्त मानों।।8
मिला गर है जीवन ,तो मृत्यु भी सच है।
कमल यदि खिला है,फिर संकुचन भी लिखा है।।0
आत्मा स्वयं शुद्ध परमात्मा है।
नही शस्त्र खंडन,नही अग्नि दाहन,नही जल क्लेदन,
नही वायु शोषन कर सका है।।11
जय पराजय छोड़कर,हो जाओ अब समत्व तुम।
तजो द्वैत भाव को ,अब हो जाओ अद्वैतभाव तुम।।12
रणधर्मक्षेत्र में मिला जान ,सकल धरा को।
दान,यज्ञ, तप,पावन करें मनुज को।।13
अर्जुन नें पूंछा,कहो हे माधव,वायु सा दुष्कर हमारा मन है।
सुनो पृथासुत ,नही कठिन है,अभ्यास योग से बड़ा ना मन है।।14
पहले गिनाया पांडवों के पास क्या कितना है।
बाद में बताया हमारा,क्षेत्र ना केवल इतना है।।15
अपराजेय द्रोण, अपराजेय भीम,अपराजेय कर्ण है।
पांच पांडव महारथी,गवालाकृष्ण निशस्त्र है।।16
दुर्योधन को हर्ष हो,भीष्म ने किया संखनाद तब।
कृष्ण ने है छेणी राग,पांचजन्य ,धनंजय देवदत्त की।।17
वृकोदर करें पौण्ड्र से,धर्मराज अनन्तविजय से ।
सुघोषमणि पुष्पक से नकुल सहदेव भी।।18
अर्जुन ने कहा प्रभू ले चलिये रथचमू मध्य में।
देखलूँ मैं भी कौन पक्ष, और कौन है विपक्ष में।।19
पार्थ के सहायक योगेश्वर और कपीश्वर सज्ज हैं।
मग़र देखकर के स्वजनों को,अर्जुन व्यग्र हैं।।20
छूट रहा गाण्डीव भी,गांडीवधारी बलवान से।
है शरीर कांप रहा,वैरियों के मोह से।।21
स्वजनों का वध करके,कैसे सुख पाउँगा।
ना ही राज्य ना ही विजय रख पाउँगा।।22
मायापाश में फसा,जान दे रहा मायापति भगवान को।
सत है क्या असत है क्या,पता नही इंसान को।।23
कुल के नष्ट होने पर,कुलपरंपरा नष्ट हो जायेगी।
शेषकुल में अधर्म,दूषित स्त्रियाँ हो जाएंगी।।24
डूबशोक सागर में ,पार हो ना पाउँगा।
प्रिय बंधु बांधवों पे,गाण्डीव ना उठा पाऊंगा।।25
(दूसरा अध्याय)
पंडित नही करते शोक,कभी प्रियवर।।6
ये पांचभौतिक सत तो नही है।
मग़र आत्मा असत तो नही है।।7
पुराने बसन त्याग,नवीन वस्त्र धारो।
बधा है शरीर,आत्मा को मुक्त मानों।।8
मिला गर है जीवन ,तो मृत्यु भी सच है।
कमल यदि खिला है,फिर संकुचन भी लिखा है।।0
आत्मा स्वयं शुद्ध परमात्मा है।
नही शस्त्र खंडन,नही अग्नि दाहन,नही जल क्लेदन,
नही वायु शोषन कर सका है।।11
जय पराजय छोड़कर,हो जाओ अब समत्व तुम।
तजो द्वैत भाव को ,अब हो जाओ अद्वैतभाव तुम।।12
रणधर्मक्षेत्र में मिला जान ,सकल धरा को।
दान,यज्ञ, तप,पावन करें मनुज को।।13
अर्जुन नें पूंछा,कहो हे माधव,वायु सा दुष्कर हमारा मन है।
सुनो पृथासुत ,नही कठिन है,अभ्यास योग से बड़ा ना मन है।।14
पहले गिनाया पांडवों के पास क्या कितना है।
बाद में बताया हमारा,क्षेत्र ना केवल इतना है।।15
अपराजेय द्रोण, अपराजेय भीम,अपराजेय कर्ण है।
पांच पांडव महारथी,गवालाकृष्ण निशस्त्र है।।16
दुर्योधन को हर्ष हो,भीष्म ने किया संखनाद तब।
कृष्ण ने है छेणी राग,पांचजन्य ,धनंजय देवदत्त की।।17
वृकोदर करें पौण्ड्र से,धर्मराज अनन्तविजय से ।
सुघोषमणि पुष्पक से नकुल सहदेव भी।।18
अर्जुन ने कहा प्रभू ले चलिये रथचमू मध्य में।
देखलूँ मैं भी कौन पक्ष, और कौन है विपक्ष में।।19
पार्थ के सहायक योगेश्वर और कपीश्वर सज्ज हैं।
मग़र देखकर के स्वजनों को,अर्जुन व्यग्र हैं।।20
छूट रहा गाण्डीव भी,गांडीवधारी बलवान से।
है शरीर कांप रहा,वैरियों के मोह से।।21
स्वजनों का वध करके,कैसे सुख पाउँगा।
ना ही राज्य ना ही विजय रख पाउँगा।।22
मायापाश में फसा,जान दे रहा मायापति भगवान को।
सत है क्या असत है क्या,पता नही इंसान को।।23
कुल के नष्ट होने पर,कुलपरंपरा नष्ट हो जायेगी।
शेषकुल में अधर्म,दूषित स्त्रियाँ हो जाएंगी।।24
डूबशोक सागर में ,पार हो ना पाउँगा।
प्रिय बंधु बांधवों पे,गाण्डीव ना उठा पाऊंगा।।25
(दूसरा अध्याय)

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