भगवती -भजन
साल में बार दो बार आती हो तुम।
चैत्र आश्विन महीने में आती हो तुम।।
अनगिनत दोष हममे भरे हैं मग़र।
स्नेह ममता की धारा,लुटाती हो तुम।।
भाव से जो भरा, वो तेरा लाल माँ।
तेरी करुणा का प्यासा,है संसार माँ।।.....साल में बार 1
रात्रियों में सुभा,है नवरात्रि माँ।
भक्त के धैर्य की,परीक्षा नवरात्र माँ।।
शब्द के जाल में,तुम्हे क्या बुनें।
तुम शरदपूर्णिमा सी जानराशि माँ।।....साल में बार 2
पालकर -पोषकर है किया इस क़दर।
ऋण कहाँ से सुरु और कहाँ हो खतम।।
स्वास जबतक चले,प्रीत न हो ख़तम।
तेरे चरणों मे डूबे रहे तन और मन।।3...साल में बार
चैत्र आश्विन महीने में आती हो तुम।।
अनगिनत दोष हममे भरे हैं मग़र।
स्नेह ममता की धारा,लुटाती हो तुम।।
भाव से जो भरा, वो तेरा लाल माँ।
तेरी करुणा का प्यासा,है संसार माँ।।.....साल में बार 1
रात्रियों में सुभा,है नवरात्रि माँ।
भक्त के धैर्य की,परीक्षा नवरात्र माँ।।
शब्द के जाल में,तुम्हे क्या बुनें।
तुम शरदपूर्णिमा सी जानराशि माँ।।....साल में बार 2
पालकर -पोषकर है किया इस क़दर।
ऋण कहाँ से सुरु और कहाँ हो खतम।।
स्वास जबतक चले,प्रीत न हो ख़तम।
तेरे चरणों मे डूबे रहे तन और मन।।3...साल में बार
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